संसद के विशेष सत्र के लिए सरकार की कोशिशें नाकाम
त्योहारों का सीजन 15 नवंबर को समाप्त हो रहा है। उसके तुरंत बाद शीतकालीन सत्र शुरू होना है। ऐसे में उस समय सरकार विशेष सत्र नहीं बुला सकती है। इसलिए यह समझ में नहीं आने वाली बात है कि सरकार ने संसद का सत्रावसान क्यों नहीं किया? उसे भी पता है कि विशेष सत्र के लिए अब समय नहीं बचा है।
द न्यूज लॉन्चर डेस्क
संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने का समय नजदीक आ गया है लेकिन मॉनसून सत्र अभी तक औपचारिक रूप से समाप्त नहीं हुआ है। दोनों सदन 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए गए थे। उसके बाद से 82 दिन बीत चुके हैं और बिना सत्रावसान के दोनों सदनों को अनिश्चितकाल तक स्थगित रखने पिछले सारे रिकॉर्ड टूट चुके हैं। लेकिन अब भी कहा जा रहा है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह दो तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिशों में लगे हैं ताकि विशेष सत्र बुला कर महिला आरक्षण कानून में संशोधन और परिसीमन विधेयक पारित करा सके।
चूंकि सरकार दो तिहाई बहुमत का इंतजाम नहीं कर पा रही है, इसलिए वह संसद का सत्रावसान भी नहीं करा रही है। इस बीच अमित शाह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राहुल गांधी द्वारा दी जा रही बहस की चुनौती के जवाब में बार-बार जवाबी चुनौती दे रहे हैं कि सरकार विशेष सत्र बुलाने को तैयार है। वे कह रहे हैं कि विशेष सत्र में राहुल गांधी और पूरा विपक्ष मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के मसले पर चर्चा कर ले, जबकि राहुल गांधी बिल्कुल अलग मुद्दों पर प्रधानमंत्री मोदी को बहस की चुनौती दे रहे हैं। वे प्रधानमंत्री पर देशद्रोही होने का आरोप लगाते हुए उस पर बहस करने को कह रहे हैं। इसीलिए वे अमित शाह की बात को महत्व नहीं दे रहे हैं। विपक्षी दल भी इसके लिए कभी तैयार नहीं होंगे।
बहरहाल, अब सरकार के सामने मुश्किल यह है कि विशेष सत्र बुलाने के लिए ज्यादा समय नहीं बचा। नवंबर के तीसरे हफ्ते में आमतौर पर संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होता है। पहले हफ्ते के अंत में या दूसरे हफ्ते के शुरू में मंत्रिमंडलीय समिति शीतकालीन सत्र बुलाने की सिफारिश राष्ट्रपति से कर देती है। उसके बाद विधायी कामकाज की तैयारी होती है। इस बीच अभी त्योहारों का समय चल रहा है, जिसके बीच सरकार विशेष सत्र नहीं बुला सकती है।
आठ नवंबर को दिवाली है और उसके बाद गोवर्धन पूजा और भाईदूज और फिर पूर्वी भारत में छठ का त्योहार है। त्योहारों का सीजन 15 नवंबर को समाप्त हो रहा है। उसके तुरंत बाद शीतकालीन सत्र शुरू होना है। ऐसे में उस समय सरकार विशेष सत्र नहीं बुला सकती है। इसलिए यह समझ में नहीं आने वाली बात है कि सरकार ने संसद का सत्रावसान क्यों नहीं किया? उसे भी पता है कि विशेष सत्र के लिए अब समय नहीं बचा है।
यह भी हैरानी की बात है कि सरकार क्यों विशेष सत्र में ही यह काम कराना चाहती है? पिछली बार भी 16 से 18 अप्रैल तक संसद का विशेष सत्र बुला कर महिला आरक्षण कानून में संशोधन और परिसीमन बिल पास कराने का प्रयास किया गया था, जिसमें सरकार विफल हो गई थी। इसके बाद सरकार ने मानसून सत्र में इसका प्रयास नहीं किया।
अब शीतकालीन सत्र में इसे पास कराने की बजाय संसद को रोक कर रखा गया है ताकि विशेष सत्र बुला कर पास कराया जाएगा। याद करें कैसे विशेष अवसर बना कर ही सरकार ने नारी शक्ति वंदन कानून पास कराया था। संसद की नई इमारत के पहले सत्र में इसे पास कराया गया था। असल में सरकार इसके जरिए एक मैसेज देना चाहती है।
वह बताना चाहती है कि महिला आरक्षण और परिसीमन बहुत बड़ा काम है, जो वह खासतौर से कर रही है। लेकिन अभी की स्थितियों को देख कर लग नहीं रहा है कि विशेष सत्र हो पाएगा। अगर सरकार चाहती है कि अगले लोकसभा चुनाव से पहले परिसीमन हो और महिला आरक्षण कानून लागू हो जाए तो उसका समय भी धीरे धीरे निकलता जा रहा है।
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