नरेंद्र मोदी का सितारा बढ़ रहा है अस्ताचल की ओर!
नरेंद्र मोदी अभी सत्ता में हैं, अमित शाह भी पॉवर में ही हैं। लेकिन कुछ है ऐसा कि लगता है अब वह इकबाल नहीं रहा। जब उनका दौर बाकायदा खत्म होगा, तब जो इस दौर की कुछ सच्चाइयाँ सामने आ सकती हैं, वे हमें बताएंगी कि नैरेटिव पर आधारित राजनीति की सफलता के पीछे कितनी गहरी धुंध होती है।
हेमंत कुमार झा
यह देश के बेरोजगारों, कामगारों, किसानों और देश की गंगा-जमुनी तहजीब व लोकतंत्र में आस्था रखने वाले हर व्यक्ति के लिए राहत भरा संकेत है कि नरेंद्र मोदी नामक सितारा तेजी से अस्त होने की ओर बढ़ चला है। उसकी रोशनी से रोशन होता अमित शाह नामक सितारे को भी खुद ब खुद निस्तेज होना ही है।
दरअसल नरेंद्र मोदी के पास बेरोजगारों के लिए कोई सार्थक और प्रभावी विजन रहा ही नहीं। लप्पेबाजी और नारेबाजी विजन की जगह नहीं ले सकती, इसलिए मोदी राज में देश में बेरोजगारी की दर पिछले पचास वर्षों में सबसे अधिक हो गई।
मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां मूलतः कॉर्पोरेट हितैषी और कामगार विरोधी रहीं। इसलिए उनके राज के पिछले दस बारह वर्षों में कॉर्पोरेट का मुनाफा जिस रफ्तार से बढ़ा उसकी आधी क्या, चौथाई भी कामगार की पगार बढ़ने की रफ्तार नहीं रही। मोदी सरकार का जाना इस देश के कामगारों के लिए शुभ संकेत माना जाना चाहिए।
मोदी सरकार के पास गरीबों के लिए कुछ भी सार्थक नहीं रहा, सिवाय कुछ किलो मुफ्त अनाज या फौरी तौर पर कुछ नकद अनुदान के। लेकिन इन टोटकों से गरीबी कम नहीं होती। भारत की लगभग 150 करोड़ आबादी में नीचे के 100 करोड़ लोगों की क्रय शक्ति नगण्य है और इस नगण्यता ने देश के बाजार की गतिशीलता पर जो नकारात्मक प्रभाव डाला है उसकी विवेचना आजकल हर आर्थिक विशेषज्ञ कर रहा है।
सवाल उठता है कि फिर मोदी आखिर करते क्या रहे इन बारह सालों में...??? वे राज करते रहे और वह भी पूरी ठसक के साथ। यह ठसक उन्होंने मिडिल क्लास की नकारात्मक साम्प्रदायिक सोच में उभार लाकर हासिल की। यह ठसक उन्होंने हिन्दी पट्टी के सवर्णों के राजनीतिक समर्थन, जो कालांतर में बेशर्म समर्थन में बदलता गया, से हासिल की और सबसे महत्वपूर्ण, भ्रष्टाचार, निजी महत्वाकांक्षा और जातिवाद के आरोपों से सने, लिथड़े उत्तर भारत के कतिपय क्षेत्रीय दलों की निस्तेज विपक्षी राजनीति से उन्होंने यह ठसक हासिल की।
नरेंद्र मोदी ने यह ठसक कांग्रेस की उस गतिहीन राजनीति से भी हासिल की जिसे 2014 के चुनावी मैदान में भाजपा से पराजित होने के बाद अगले एक दशक तक यह समझ में ही नहीं आया कि आखिर उसकी राजनीति और चुनावी रणनीति का आधार क्या हो और आखिर किस पिच पर वह चुनावी बैटिंग करे।
कांग्रेस आज भी इस संदर्भ में बहुत क्लियर नहीं है। उसे राहुल की निरंतर बढ़ती जा रही राजनीतिक तेजस्विता का सहारा है और बस, इसी से उम्मीद भी है जो मोदी के बरक्स सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभर कर सामने आए हैं।
मोदी की सत्ता की ठसक में एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका उन रीढ़विहीन लोगों की रही जो लोकतंत्र के स्तंभ के रूप में स्थापित संस्थानों में शीर्ष पदों पर रहे। चाहे भय के कारण हो, लोभ के कारण हो या अन्य अज्ञात कारण हों, उनमें से अनेक ने इस देश की जनता के प्रति अपने संवैधानिक दायित्वों के पालन में कोताही की और मोदी सत्ता को सहलाने वाले कार्य करते रहे। उनमें से एक, चुनाव आयोग की फजीहत आज देश ही नहीं, दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी हुई है।
देश की न्यायपालिका ने भी इस दौरान अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाई नहीं, बल्कि आमलोगों की उसके प्रति आस्था में गिरावट ही आई है और यह इस दौर की सबसे दुखद सच्चाई है। बाकी, सीबीआई, ईडी आदि की तो बिसात ही क्या। राजनीति के मोहरे के रूप में उसकी घटिया छवि कांग्रेस के राज में ही स्थापित हो चुकी थी, मोदी राज में उस छवि में और गहरी कालिख पुती।
मीडिया की तो बात ही क्या करनी। अगर सोशल मीडिया और सिटीजन जर्नलिज्म का जमाना न आया होता तो इस देश के मीडिया ने जितना अंधेरा फैलाया है, लोग समझ भी नहीं पाते और मुख्यधारा के मीडिया को धिक्कार भी नहीं पाते।
सब कुछ के बावजूद, अगर नरेंद्र मोदी के दौर के किसी तंत्र को धिक्कारने की बात हो तो सबसे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, जिसे नेशनल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या मुख्यधारा का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कहने का प्रचलन है, को ही धिक्कारने का मन होगा। धिक्कार है उन चैनलों को, उनके एंकरों को, जो पत्रकार की शक्ल में दलाल थे या हैं।
नरेंद्र मोदी के दौर ने हमें यह भी बताया कि इस देश के बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग नैतिक और बौद्धिक रूप से कितना पतित हो सकता है। उनके पतन की गाथा कांग्रेस राज के इतिहास में भी दर्ज हुई, लेकिन, मोदी के दौर में उसके हर्फ़ मोटे होते गए, जिन्हें देखना समझना अधिक आसान है, जिन्हें देख समझ कर आम लोगों को भी शर्म आने लगी है कि ये हमारे देश के बुद्धिजीवियों की जमात में शामिल हैं।
नरेंद्र मोदी अभी सत्ता में हैं, अमित शाह भी पॉवर में ही हैं। लेकिन कुछ है ऐसा कि लगता है अब वह इकबाल नहीं रहा। जब उनका दौर बाकायदा खत्म होगा, तब जो इस दौर की कुछ सच्चाइयाँ सामने आ सकती हैं, वे हमें बताएंगी कि नैरेटिव पर आधारित राजनीति की सफलता के पीछे कितनी गहरी धुंध होती है। थोड़ा इंतजार करना होगा।
(लेखक पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं)
Comments
No comments yet. Be the first to share your thoughts!
Leave a Comment