Sunday, November 1, 2026
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इतिहास ऐसे ही करवट बदलता है!

इतिहास ऐसे ही करवट बदलता है!

भारत में "मोदीनॉमिक्स" के रूप में क्रोनी कैपिटलिज्म के प्रपंची साये में जब आर्थिक विफलताओं और घनघोर रूप से बढ़ती आर्थिक असमानता ने विकट रूप धारण कर लिया तो आज राजनीतिक सामाजिक असमंजस देश के सिर चढ़ कर बोल रहा है और तरह-तरह के आंदोलनों से अपने को अभिव्यक्त कर रहा है।

हेमंत कुमार झा

इतिहास जब करवट बदलने को तैयार होने लगता है तो उसका पहला मुखर प्रतिबिंब राजनीतिक संघर्षों में दिखाई देता है। यूरोप से लेकर भारत तक आंदोलनों की जो लहर चल रही है और बीते 40-45 वर्षों से मजबूत होते गए जिन राजनीतिक-आर्थिक विमर्शों को जमीनी स्तरों पर अब गंभीर चुनौतियां मिलने लगी हैं उनमें हम इस प्रतिबिंब को स्पष्ट देख सकते हैं।

जो दुनिया आज हमारे सामने है उसकी सबसे मजबूत और प्रभावशाली पृष्ठभूमि 1980 के दशक में बनी थी जब अमेरिका में रोनाल्ड रीगन और ब्रिटेन में मार्गरेट थैचर का राज था।
रीगनोमिक्स...रोनाल्ड रीगन की आक्रामक आर्थिक नीतियों के लिए तब विशेषज्ञों ने इसी शब्द का ईजाद किया था।
थैचरिज्म...यह शब्द मार्गरेट थैचर की उन आर्थिक नीतियों को परिभाषित करने के लिए गढ़ा गया था जो एक शासक के रूप में इन संदर्भों में रीगन से भी अधिक प्रतिबद्ध और मुखर थीं।

सीधी सपाट भाषा में कहें तो इन नीतियों का निचोड़ था...सार्वजनिक सेवाओं और उद्योगों का अधिकाधिक निजीकरण और इनका आक्रामक रूप से तीव्र क्रियान्वयन। बाजार की मुक्ति और नियमनों में कमी इसके प्रमुख तत्व थे। इसके लिए ट्रेड यूनियनों को शक्तिहीन बनाना आवश्यक था तो इस हेतु प्रत्यक्ष और परोक्ष हर तरह के प्रयास किए गए। यूनियनों पर कानूनी बंदिशें लगाई गईं और जनता की नजरों में उन्हें गिराने के लिए प्रोपेगेंडा विमर्शों का पर्याप्त सहारा लिया गया। मीडिया में ऐसे लेखों की बाढ़ आ गई जिनमें बताया जाता था कि किस तरह फलां शहर के उद्योग या फलानी औद्योगिक इकाई "यूनियनबाजी" के चक्कर में बर्बाद हो गई आदि आदि।

विशेषज्ञ बताते रहे कि इन बर्बादियों के लिए यूनियनों से कई गुने अधिक जिम्मेदार राजनेताओं के भ्रष्टाचार और उनकी अयोग्यता है। लेकिन, कॉर्पोरेट स्वामित्व की बढ़ती जकड़बंदी और उनके आर्थिक-राजनीतिक हितों के लिए उपकरण बनते मुख्य धारा के मीडिया ने यूनियनों को बदनाम करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।

इधर..1985 आते आते सोवियत अर्थव्यवस्था पर लंबे समय से चल रहे शीतयुद्ध की नकारात्मकताओं का असर साफ नजर आने लगा था। नए सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव की "ग्लासनोस्त" और "पेरेस्त्रोइका" के रूप में इनसे निपटने के प्रयास शुरू हुए लेकिन अन्तर्विरोध इतने गहरे हो चुके थे कि ये प्रयास पर्याप्त साबित नहीं हुए।

ग्लासनोस्त...यानी खुलापन, अपेक्षाकृत अधिक पारदर्शिता।
पेरेस्त्रोइका...यानी आर्थिक पुनर्रचना, बाजार में थोड़ा खुलापन लाने के प्रयास।

रीगन ने "स्टारवार्स" की परिकल्पना के साथ जिस आक्रामक अंदाज में अमेरिका को प्रस्तुत किया उसने शीतयुद्ध को ऐसे मुकाम पर पहुँचा दिया जिसमें सोवियत संघ पर आर्थिक दबाव बढ़ना ही था। रीगन-गोर्बाचेव शिखर वार्ताओं के कई दौर चले और इतिहास के करवटें बदलने का एक चक्र पूरा हुआ। अंततः सोवियत विघटन और नए जन्मे देशों में अचानक से बढ़ गई घोर आर्थिक अराजकताओं ने रीगनोमिक्स और थैचरिज्म के प्रवक्ताओं को यह "सुअवसर" प्रदान किया कि वे सार्वजनिक सेवाओं के निजीकरण को जनता की नजरों में "बेहतर और निर्णायक" विकल्प के रूप में प्रतिष्ठापित करें।

सोवियत संघ से टूट कर नए बने देशों में सार्वजनिक सेवाओं और सरकारी औद्योगिक इकाइयों को औने पौने दामों में खरीद कर जनता को लूटने और कामगारों के शोषण का नया मंच सजने लगा। उसी दौर में पहली बार "गैंगस्टर कैपिटलिज्म" नामक शब्द चर्चा में आया क्योंकि सत्ता संरचना में कॉर्पोरेट शक्तियों का प्रभाव इस हद तक बढ़ने लगा कि उन्होंने संदिग्ध तरीकों से सार्वजनिक संसाधनों पर कब्जा करना शुरू किया।

सोवियत संघ के पतन के कारणों पर विमर्शों के कई अध्याय हैं और उनकी अनगिनत परतें हैं, लेकिन नवउदारवाद के पैरोकारों को जनता की नजरों में अपने विमर्शों को प्रतिष्ठित करने के लिए खुला मंच मिला।
ब्रिटेन में 1948 में ही रेलवे का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया था। मार्गरेट थैचर ने उसके निजीकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी। अन्य सार्वजनिक सेवाओं और सरकारी स्वामित्न की औद्योगिक इकाइयों का तीव्र निजीकरण उनके एजेंडा में सबसे ऊपर था। "देअर इज नो अल्टरनेटिव"...थैचर ने अपनी आर्थिक नीतियों के संदर्भ में कहा था। दुनिया के अनेक देशों ने इसे प्रेरणा के रूप में ग्रहण किया। "टीना इफेक्ट"...विशेषज्ञों ने इस प्रेरणा को यही नाम दिया। "टीना"...यानी देअर इज नो अल्टरनेटिव।

यूरोप से लेकर भारत तक के लोकतांत्रिक देशों में राजनीति पर वैश्विक वित्तीय शक्तियों का प्रभाव बढ़ने लगा और नई बनती आर्थिक संरचना के सबसे प्रमुख पैरोकारों में इन देशों का मध्यवर्ग सामने आया। हाशिये पर के लोगों की आवाजों के प्रवक्ता के रूप जिन विचारकों ने अपनी बातें कहने की कोशिश की उन्हें "अप्रासंगिकताओं का अरण्य रोदन" करार देने के सुनियोजित प्रयास भी समानांतर चलते रहे और मध्यवर्ग इन नैरेटिव्स से भी प्रभावित होने वालों में सबसे आगे था।

ब्रिटेन में रेलवे के निजीकरण की प्रक्रिया थैचर के कार्यकाल में शुरू हुई और उनके उत्तराधिकारी जॉन मेजर के समय में पूरी हुई। यूरोप, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका से लेकर ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड तक अन्य कई देशों ने भी यही रास्ता अपनाया। अन्य सार्वजनिक सेवाओं के साथ भी यही हुआ। औद्योगिक संरचना में सरकारों के प्रभुत्व को कम करने के अन्य सारे उपक्रम भी आगे बढ़ते गए। ट्रेड यूनियर बिखरते गए, कमजोर होते गए और दशकों के संघर्षों से हासिल श्रम अधिकारों को छीनने के कॉर्पोरेट षडयंत्र सफल होते गए।

निजीकरण के बढ़ते प्रभाव के दायरे में जब शिक्षा और स्वास्थ्य को शामिल किया जाने लगा तो मध्य वर्ग ने इसका खुला खैरमकदम किया। अनिवार्य सार्वजनिक सेवाएं सरकारों की जिम्मेदारी है, इस तर्क को मुनाफे के तर्कों के कोलाहल में कुंद कर दिया गया। अच्छे निजी अस्पतालों में इलाज कराना और अच्छे प्राइवेट स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाना मिडिल क्लास के लिए स्टेट्स सिंबल बन गया। वह सरकारी संस्थानों की दुर्दशा से नजर फेर कर अपनी ही दुनिया में विचरने लगा और इस तरह हाशिए पर की आबादी से खुद को विशिष्ट मानने के अहसास से सराबोर हो यह सोचने की क्षमता खोने लगा कि एक दिन शैक्षणिक और स्वास्थ्य संरचना का बदलता यह स्वरूप उसके लिए भी भस्मासुर साबित होने वाला है।

भारत जैसे देशों में पब्लिक सेक्टर की नौकरियों ने मध्य वर्ग के विस्तार और उसकी आर्थिक सुस्थिरता में बड़ा योगदान दिया था किंतु मुक्त होते बाजार और सर्वग्रासी उपभोक्तावाद ने जिन आर्थिक विमर्शों के व्यामोह में मध्य वर्ग को घेर लिया था उनके दुष्परिणामों के घेरे में भी एक दिन उन्हें आना ही था। वह घेरा जब कसने लगा तो मध्यवर्ग में छटपटाहट के संकेत मिलने लगे।

भारतीय मध्यवर्ग की वैचारिक विपन्नता का आलम यह था कि उसे और उसके बच्चों को नौकरी तो सरकारी चाहिए थी किंतु संस्थान निजी चाहिए थे। वह यहां तक चाहने लगा कि जिस संस्थान में वह नौकरी करता है वह तो सरकारी रहे लेकिन बाकी सारे निजी क्षेत्र में चले जाएं जहां वह अपनी क्रय क्षमता का उपयोग कर भीड़ से अलग दिखने और सुविधा भोगने का आनंद ले सके। लेकिन यह होना नहीं था और आज मध्यवर्गीय छटपटाहट खुल कर नजर आने लगी है।

बाजार के मुक्त होते प्रागण में कामगारों ने अपने श्रम अधिकार खोए, शिक्षकों ने अपनी गरिमा खोई, समाज ने डॉक्टरों को मुनाफाखोर बनिया में बदलते देखा, हाशिए पर की आबादी ने अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा से खुद को पूरी तरह वंचित होते देखा। देशों की जीडीपी और आम लोगों की आर्थिक स्थिति में सामंजस्य टूटने लगा। मुनाफे के तर्क से चलने वाली व्यवस्था ने मनुष्यता के न्यूनतम मूल्यों का भी अतिक्रमण करना जब शुरू किया तो जन सामान्य का असंतोष अधिक मुखर होने लगा।

भारत जैसे जनसंख्या बहुल किंतु निर्धन देशों में, जहां औद्योगिक संरचना का अपेक्षित विस्तार तो नहीं हो सका लेकिन सर्विस सेक्टर का असीमित विस्तार हुआ और इसने मानवीय श्रम के शोषण का नया अध्याय रचना शुरू किया। मध्य वर्ग ने शुरू में इस शोषण का आनंद लिया क्योंकि उसे सस्ते दर पर सेवा मिलती थी लेकिन अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना के बदलते स्वरूप ने आज ऐसी स्थिति ला दी है कि इंजीनियर का बेटा डिलीवरी ब्वॉय और गांव के मध्यवर्गीय किसानों का बेटा महानगरों में सिक्यूरिटी गार्ड तक बनने को विवश हो रहा है। स्थायी पदों के लिए भी आउटसोर्सिंग नियुक्ति की कर्मचारी विरोधी प्रवृत्ति मिडिल क्लास के बच्चों के लिए आज नासूर बन चुकी है जहां वे गुलाम, बेआवाज और आर्थिक रूप से बदतरीन तरीके से शोषित कामगारों के रूप में तब्दील हो चुके हैं। जिन अधिकारों को उनके दादा की पीढ़ी ने हासिल किया, उनके बाप की पीढ़ी ने उसे हथेलियों से फिसलने दिया और आज वह इन असंगतियों और अमानवीयताओं का सीधा शिकार है।

चार दशक बीतते बीतते रीगनोमिक्स का फलसफा अमेरिका में ही चुनौतियों के रूबरू है। बिखरते संस्थानों, तीव्र गति से बढ़ती आर्थिक असमानता से बिखरता अमेरिकी समाज पुनरावलोकन की प्रक्रिया में है। 2008 में जब बराक ओबामा पहली बार राष्ट्रपति चुनाव जीते तो अपने पहले राष्ट्रीय संबोधन में उन्होंने कहा "बाजार को उसकी असीमित मुक्ति के रास्ते पर छोड़ा नहीं जा सकता"। बाद के अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी बाजारवादी नीतियों की उच्छृंखलताओं के खिलाफ कई बार चेतावनी दी और इसके दुष्परिणामों को स्वीकार किया।

भारत में "मोदीनॉमिक्स" के रूप में क्रोनी कैपिटलिज्म के प्रपंची साये में जब आर्थिक विफलताओं और घनघोर रूप से बढ़ती आर्थिक असमानता ने विकट रूप धारण कर लिया तो आज राजनीतिक सामाजिक असमंजस देश के सिर चढ़ कर बोल रहा है और तरह तरह के आंदोलनों से अपने को अभिव्यक्त कर रहा है।

समय ने बता दिया कि बाजार की मुक्ति और मनुष्यता के मौलिक सिद्धांतों के बीच असंतुलन एक बीमार समाज को जन्म देता है। आज भारत तो इसके ज्वलंत उदाहरण के रूप में सामने है ही, यूरोप के कई सम्पन्न देश भी इस असंतुलन की चपेट में हैं और वहां के समाज भी खुद की बीमारी की पहचान कर आज सड़कों पर आंदोलित हैं। बाजार की असंतुलित और अबाध मुक्ति और बढ़ती बेरोजगारी का गहरा संबंध अब उजागर हो चुका है, विकास की मुख्य धारा से हाशिए पर की बड़ी आबादी का बाहर हो जाना और इस प्रक्रिया का लाइलाज हो जाना अब स्थापित तथ्य है, मध्यवर्ग में बढ़ती हताशा अब खुली आँखों से देखी जा सकती है और वे अपनी विचारहीनता का फूटा ढोल गले में टांगे सड़कों पर नए विचारों की तलाश में हैं।

इतिहास करवट ले रहा है। जिस ब्रिटेन ने रेलवे का निजीकरण कर दिया था वह फिर से उसके राष्ट्रीयकरण की राह पर है और अगले 2027 तक इस प्रक्रिया को पूरी कर लेने का लक्ष्य रखा गया है। अन्य कई देशों में भी यही प्रक्रिया या तो पूरी कर ली गई है या अपनी राह पर आगे बढ़ रही है।

भारत में नरेंद्र मोदी की सरकार अगर आज भी रेलवे, सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों आदि के निजीकरण की बातें करती है या इस प्रक्रिया में आगे बढ़ रही है तो इसलिए कि वे और उनका राजनैतिक संगठन आर्थिक वैचारिकी के मामले में विपन्न है। वे राष्ट्रवाद, धर्मवाद, कोरे भाषणवाद, प्रोपेगेंडावाद आदि के सहारे जब तक अपनी सत्ता खींच ले सकते हैं, खींच रहे हैं। उनकी सत्ता और उनकी विपन्न वैचारिकी जिन चुनौतियों का सामना अब कर रही है उससे पार वे नहीं पा सकते।

यूरोप से लेकर भारत तक, हर ज़िन्दा देश की जनता आज उस सत्ता संरचना को चुनौती देने की मुद्रा में है जो जनता के हितों की कीमत पर मुनाफा के तर्क से संचालित है, जो कॉर्पोरेट शक्तियों के हितों की बंधक बन जनता के सामने प्रपंच करती रही है। आंदोलनों के दौर रुक रुक कर ही सही, जारी रहेंगे और धीरे धीरे सघन होते जाएंगे, क्योंकि स्थापित संरचनाएं अपनी विफलताओं के साथ निर्लज्ज तरीके से असीमित समय तक राज नहीं कर सकती। इतिहास करवट ले रहा है और जनता अपने हितों के लिए विचारों के नए अन्वेषण की ओर बढ़ रही है। इस तीव्र होती आंधी में हर उस राजनीतिक नेता और पार्टी को अप्रासंगिक हो कर परिदृश्य से ओझल हो जाना है जो जन आकांक्षाओं के संदर्भ में विफलताओं का प्रतीक बन चुका है।

(लेखक पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं)

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