Sunday, November 1, 2026
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विधान परिषद चुनाव में भाजपा के सारे प्रतीक ध्वस्त

विधान परिषद चुनाव में भाजपा के सारे प्रतीक ध्वस्त

हाल ही के विधान परिषद चुनाव का सबसे बड़ा संकेत यही है कि भाजपा धार्मिक प्रतीकों जितना इस्तेमाल कर सकती थी, वह कर चुकी है। लोग अब धार्मिक प्रतीकों की राजनीति से ऊब गए हैं। एक तरह से विधान परिषद चुनाव के ये नतीजे भी बिल्कुल 2024 के लोकसभा चुनाव जैसे ही रहे हैं।

अनिल जैन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी तमाम नेता बम-बम है कि भाजपा ने चार राज्यों में विधान परिषद की 28 में से 13 सीटें जीत लीं और तीन सीटें उसके सहयोगी दलों को भी मिल गईं। इस प्रकार उसके राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन एनडीए को कुल 16 सीटें मिल गईं। लेकिन इस चुनाव की एक खास बात यह रही कि भाजपा के लिए प्रतीकात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण सीटों पर उसे विपक्षी पार्टियों के हाथों हार का सामना करना पड़ा है, जो कि उसके लिए किसी झटके से कम नहीं है। मगर इन 16 सीटों पर एनडीए को मिली जीत पर ठुमके लगा रहा मुख्यधारा का मीडिया भाजपा को लगे इस झटके की जरा भी चर्चा नहीं कर रहा है।

भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी हो या न हो लेकिन धार्मिक और सांप्रदायिक प्रतीकों के सहारे राजनीति करने वाली वह दुनिया की एकमात्र पार्टी है। इन प्रतीकों के सहारे ही वह सत्ता तक पहुंची है और 2014 के बाद कई चुनाव जीती है। हालांकि चुनावों में धार्मिक और सांप्रदायिक प्रतीकों का इस्तेमाल करना कानूनन अपराध है, लेकिन नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह कानून लगभग बेअसर हो गया है। चूंकि प्रधानमंत्री मोदी खुद इन प्रतीकों का जम कर इस्तेमाल करते हैं, लिहाजा भाजपा पर यह कानून लागू नहीं होता है। अलबत्ता विपक्षी पार्टियों के मामले में चुनाव आयोग पूरी तरह सतर्क रहता है।

बहरहाल, हाल ही के विधान परिषद चुनाव का सबसे बड़ा संकेत यही है कि भाजपा धार्मिक प्रतीकों जितना इस्तेमाल कर सकती थी, वह कर चुकी है। लोग अब धार्मिक प्रतीकों की राजनीति से ऊब गए हैं। एक तरह से विधान परिषद चुनाव के ये नतीजे भी बिल्कुल 2024 के लोकसभा चुनाव जैसे ही रहे हैं। लोकसभा चुनाव में भाजपा बहुमत से दूर रह गई थी लेकिन उसके गठबंधन को सामान्य बहुमत मिल गया था। धार्मिक प्रतीकों के ध्वस्त होने का सिलसिला भी उसी चुनाव से शुरू हो गया था।

लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने फैजाबाद लोकसभा सीट पर भाजपा को हरा कर बड़ा उलटफेर किया था। फैजाबाद वह सीट है, जिसमें अयोध्या भी आता है। अयोध्या पिछले करीब चार दशकों से भाजपा की राजनीति के केंद्र में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले वहां आधे-अधूरे बने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का उद्घाटन करके अपना चुनाव अभियान अभियान शुरू किया था। इसलिए वहां हारना उसके लिए और भाजपा व आरएसएस के लिए भी बहुत बड़ा झटका था। इसीलिए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के नेता वहां से जीते अवधेश प्रसाद को ट्रॉफी की तरह लेकर घूमते हुए भाजपा को चिढ़ा रहे थे।

फैजाबाद लोकसभा सीट सामान्य यानी अनारक्षित है लेकिन वहां समाजवादी पार्टी ने दलित समुदाय के अवधेश प्रसाद को अपना उम्मीदवार बनाया था, जिन्होंने वहां से लगातार दो बार जीते भाजपा के लल्लू सिंह को हराया था। लल्लू सिंह इससे पहले 2014 और 2019 में वहां से जीते थे।

2024 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपनी वाराणसी सीट से बड़ी मुश्किल से जीते थे। वोटों की गिनती के शुरुआती कई राउंड में कांग्रेस उम्मीदवार से पिछड़ने के बाद वे जैसे-तैसे लगभग डेढ़ लाख वोटों से जीते थे, जबकि 2019 के लोकसभा चुनाव में वे लगभग पांच लाख वोटों के अंतर से जीते थे। इस बार विधान परिषद चुनाव में वाराणसी क्षेत्र की दोनों सीटें भाजपा हार गई। हालांकि पिछली बार भी ये दोनों सीटें भाजपा हारी थी लेकिन तब इस बार की तरह आमने-सामने का चुनाव नही था। वाराणसी शिक्षक और वाराणसी स्नातक दोनों सीटों समाजवादी पार्टी जीती है।

वाराणसी की तरह ही प्रयागराज (इलाहाबाद) की सीट पर भी भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा है। आगरा की एक सीट भी भाजपा हारी है, जिसमें मथुरा का इलाका भी आता है। लखनऊ स्नातक की सीट पर भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है।

उधर महाराष्ट्र में भाजपा को अपनी बेहद प्रतिष्ठापूर्ण नागपुर सीट पर भी हार का सामना करना पड़ा है। नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय है। नागपुर इकलौती सीट है जो कांग्रेस जीती है। इसलिए भी इसका अलग महत्व हो गया है। इसी तरह बिहार की पटना शिक्षक सीट पर भी भाजपा को हार का सामना करना पडा है। पिछले 30 साल से भाजपा यह सीट जीत रही थी। यह नतीजा इसलिए भी अहम है क्योंकि भाजपा को उसके समर्थक मतदाताओं की बहुलता वाली इस सीट पर राष्ट्रीय जनता दल ने हराया है।

इन सभी सीटों का प्रतीकात्मक महत्व कई कारणों से है। ये सभी सीटें भाजपा का गढ़ मानी जाती हैं। इनमें से कुछ सीटें धार्मिक आस्था की वजह से भी महत्वपूर्ण हैं और साथ ही भाजपा के सभी बड़े नेताओं का कनेक्शन इन सीटों से है। बाबा विश्वनाथ की नगरी के रूप में प्रसिद्ध वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निर्वाचन क्षेत्र है तो लखनऊ रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का। कुंभ नगरी प्रयागराज में एक साल पहले ही कुंभ का आयोजन हुआ था, जिसे भाजपा ने विश्वस्तरीय सफल आयोजन के तौर पर प्रचारित किया था। वैसे प्रयागराज में भाजपा को 2024 के लोकसभा चुनाव में भी गहरा झटका लगा था। वहां उसे कांग्रेस के हाथों हार का सामना करना पड़ा था।

नागपुर में आरएसएस का मुख्यालय होने के साथ ही भाजपा के दिग्गज नेता और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस का गृह नगर और निर्वाचन क्षेत्र भी है। इसी तरह पटना भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का क्षेत्र है, जहां से पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद सांसद हैं। हाल ही में नितिन नवीन के इस्तीफ़े से खाली हुई बांकीपुर विधानसभा सीट पर भी भाजपा हार गई थी। उसका वह जख्म अभी भरा भी नहीं था कि राष्ट्रीय जनता दल ने पटना शिक्षक सीट पर हरा कर उसे नया जख्म दे दिया। योगी आदित्यनाथ के गोरखपुर में भी भाजपा जैसे-तैसे ही जीत सकी।

चूंकि भाजपा धार्मिक प्रतीकों की राजनीति करने में माहिर है और अयोध्या, वाराणसी, प्रयागराज और मथुरा धार्मिक आस्था के केंद्र माने जाते हैं। ये सभी शहर प्रतीकात्मक रूप से भाजपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। अयोध्या में राम मंदिर बन जाने के बाद से ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और दूसरे कई नेता काशी और मथुरा के मुद्दे जब-तब उछालते रहते हैं। अब वाराणसी और आगरा-मथुरा मिली हार के बाद शायद इन मुद्दों की धार पहले जैसी नहीं रह पाएगी।

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