सुप्रीम कोर्ट इतना लाचार पहले कभी नहीं रहा
एक दशक पहले तक किसी हाई कोर्ट या निचली अदालत ने भी व्यापक जनहित के किसी मुद्दे पर ऐसी लाचारी नहीं दिखाई, जैसी अभी सुप्रीम कोर्ट दिखा रहा है। सवाल है कि जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अमल नहीं होता है तो फिर अदालतों के होने का क्या मतलब?
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट कितना असहाय हो गया है, इसे पटाखों को लेकर की गई उसकी टिप्पणी से समझा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बार दीपावली पर दिल्ली-एनसीआर में पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का आदेश देने से इनकार करते हुए कहा है, चूंकि हमारे आदेश लागू नहीं होते हैं तो वे मजाक बन जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट की यह बेचारगी भरी टिप्पणी बताती है कि देश की सर्वोच्च अदालत अपनी हनक पूरी तरह खो चुकी है या फिर उसका हरण कर लिया गया है।
एक दशक पहले तक किसी हाई कोर्ट या निचली अदालत ने भी व्यापक जनहित के किसी मुद्दे पर ऐसी लाचारी नहीं दिखाई, जैसी अभी सुप्रीम कोर्ट दिखा रहा है। सवाल है कि जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अमल नहीं होता है तो फिर अदालतों के होने का क्या मतलब? क्या सुप्रीम कोर्ट के जजों का काम सिर्फ आसंदी पर बैठ कर लोगों को प्रवचन देना भर ही रह गया है। जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट प्रकारांतर से यह मान रहा है कि देश में अराजकता की स्थिति है और कानून का राज खत्म हो गया है।
सब जानते हैं और माननीय अदालत भी जानती ही होगी कि कि पटाखे पर्यावरण के लिए कितने हानिकारक होते हैं और फिर दिल्ली का तो दुनिया के पांच सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार होता है, जहां हर सर्दी के मौसम में श्वांस के मरीजों की संख्या में 20 से 25 फीसदी तक की वृद्धि दर्ज की जाती है। बढ़ते वायु प्रदूषण की वजह से छोटे बच्चों, बुजुर्गों और पहले से दमे के मरीजों की समस्या सर्दी के दिनों में ज्यादा गंभीर हो जाती है। इन्हीं सारे तथ्यों के मद्देनजर जनहित याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया था कि वह दिल्ली-एनसीआर में दीपावली के मौके पर पटाखों को पूरी तरह प्रतिबंधित करने का आदेश पारित करे।
याचिकाकर्ता के वकील के अलावा एमिकस क्यूरी अपराजिता सिंह ने भी अदालत को बताया कि पटाखों से निकलने वाले पीएम2.5 जैसे बेहद छोटे कण फेफड़ों में पहुंच कर खून के जरिए शरीर में फैल सकते हैं। उन्होंने बताया कि दिल्ली के डॉक्टर अब 14 से 16 साल के बच्चों के फेफड़ों में भी काले धब्बे देख रहे हैं, जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया है। अपराजिता सिंह ने कहा कि ग्रीन पटाखे भी पूरी तरह प्रदूषण मुक्त नहीं हैं, क्योंकि इनमें सामान्य पटाखों के मुकाबले उत्सर्जन करीब 30 फीसदी कम होता है लेकिन इनसे भी प्रदूषण फैलता है। उन्होंने कहा कि जब प्रदूषण की स्थिति गंभीर होने पर निर्माण कार्य रोकने और स्कूलों को ऑनलाइन करने जैसे कदम उठाए जाते हैं तो ऐसे में पटाखे चलाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
लेकिन ये सारी दलीलें बेअसर रहीं। याचिका की सुनवाई कर रही पीठ के जज जस्टिस एमएम सुंदरेश और प्रसन्न बी. वराले ने साफ कहा कि वे पटाखों पर पूरी तरह रोक लगाने के पक्ष में नहीं हैं। इस सिलसिले में उन्होंने लोगों की धार्मिक भावनाओं का हवाला देते हुए कहा कि पटाखों पर रोक लगाने से लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट के जजों से और कुछ नहीं तो यह तो उम्मीद की ही जाती है कि वे किसी मामले की सुनवाई करते और फैसला देने में वैज्ञानिक चेतना का उपयोग करेंगे, लेकिन अफसोस की बात है कि दोनों जजों ने वह दलील दी जो आमतौर पर वाट्सएप यूनिवर्सिटी में अनपढ़ और वाचाल लोग देते हैं।
सवाल है कि पटाखों से दीपावली और किसी की धार्मिक मान्यताओं व परंपरा का क्या रिश्ता है? माननीय जजों को यह सामान्य तथ्य मालूम होना चाहिए कि पटाखों में इस्तेमाल होने वाले बारूद का भारत से परिचय सबसे पहले मुगल बादशाह बाबर ने करवाया था। राणा सांगा के बुलावे पर बाबर जब इब्राहिम लोदी से लड़ने आया था तो अपने साथ बारूद और तोपचियों को भी लेकर आया था। उससे पहले भारत में कोई नहीं जानता था कि बारूद क्या होता है। किसी हिंदू धार्मिक ग्रंथ में भी पटाखों का उल्लेख नहीं मिलता है। इसलिए यह दलील बेमतलब और बकवास है कि पटाखों पर प्रतिबंध से लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं।
यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि सर्वोच्च अदालत को मूर्ख और वाचाल लोगों की बोगस धार्मिक भावनाओं की फिक्र है लेकिन पटाखों से पर्यावरण को होने वाले नुकसान और बीमार लोगों को होने वाली परेशानी की कोई परवाह नहीं है। कहने की आवश्यकता नहीं कि सुप्रीम कोर्ट के ऐसे ही रवैये की वजह उसके प्रति आम लोगों का भरोसा और सम्मान लगातार कम हो रहा है।
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