इसकी फिक्र किसी को नहीं
जिन आईनों में अपनी बेहतर सूरत नहीं दिखती, हालिया वर्षों में उनकी साख पर हमला करने का अफसोसनाक रुझान भारत में उभरता दिखा है। लेकिन ऐसा नजरिया अपनी कमियों से आंख चुराने की कोशिश ही माना जाएगा।
संपादकीय
भारत में स्कूली शिक्षा या उच्च शिक्षा की बदहाली कभी भी आम लोगों में चर्चा का विषय नहीं बनती। 2047 तक भारत को विकसित बनाने का शिगूफा छोडने वाली मौजूदा सरकार के लिए तो यह मुद्दा मायने ही नहीं रखता। मुख्यधारा के मीडिया का ध्यान भी इस तरफ बहुत कम ही जाता है। अखबारों में तो कभी कभार इस पर कोई लेख या रिपोर्ट आ जाती है, लेकिन सरकारी भोंपू बन चुके टीवी चैनलों के लिए तो यह कोई मुद्दा ही नहीं है। हाल ही में क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग की जो ताजा रिपोर्ट जारी हुई है, उसे लेकर भी देश में सन्नाटा पसरा हुआ है।
इस रैंकिंग में लगातार दूसरे वर्ष भारत के किसी विश्वविद्यालय को एशिया के टॉप 50 की सूची में जगह नहीं मिली है। ध्यान देने योग्य है कि ये सूची पूरी दुनिया की नहीं, सिर्फ एशिया की है। दरअसल इस ताजा रिपोर्ट पर गौर करें, तो जाहिर होता है कि देश के कई प्रमुख संस्थानों की रैंकिंग में और गिरावट दर्ज की गई है। भारत के लिए संतोष की बात सिर्फ यह हो सकती है कि क्यूएस सूची में अब देश के 325 संस्थान शामिल हैं। पिछले साल यह संख्या 294 थी। लिस्ट में चीन के 448 उच्च शिक्षा संस्थानों के नाम हैं, जिसके बाद सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व भारत का ही है।
इस रूप में कहा जा सकता है कि संख्यात्मक रूप में देश ने प्रगति की है। लेकिन गुणात्मक रूप में गिरावट कम-से-कम उतने ही अफसोस की बात है। ताजा सूची में शीर्ष 100 संस्थानों के बीच भारत के केवल छह संस्थान जगह बना पाए हैं, जबकि पिछली रिपोर्ट में सात भारतीय संस्थान शामिल थे। इस बार जिन छह संस्थानों को जगह मिली है, उनमें पांच भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के साथ बंगलुरू स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान शामिल है। क्यूएस रैंकिंग की ऐसी आलोचनाओं का जिक्र कर भारतवासी जरूर संतोष पा सकते हैं कि यह सूची प्रतिष्ठा सर्वेक्षणों पर काफी हद तक निर्भर करती है, जिससे पहले से मशहूर विश्वविद्यालयों को इससे अतिरिक्त लाभ मिल जाता है।
जिन आईनों में अपनी बेहतर सूरत नहीं दिखती, हालिया वर्षों में उनकी साख पर हमला करने का अफसोसनाक रुझान भारत में उभरता दिखा है। लेकिन ऐसा नजरिया अपनी कमियों से आंख चुराने की कोशिश ही माना जाएगा। इसलिए कि क्यूएस रैंकिंग तैयार करते वक्त संस्थान की शैक्षणिक प्रतिष्ठा, रोजगार देने वाली कंपनियों के बीच प्रतिष्ठा, वहां हुए शोध के प्रभाव, शिक्षक-छात्र अनुपात, अंतरराष्ट्रीय शिक्षकों एवं छात्रों की मौजूदगी, डिग्री लेकर निकलने के बाद रोजगार मिलने के अनुपात आदि को भी ध्यान में रखा जाता है। क्या ये जरूरी मानदंड नहीं हैं? जरूरत इन कसौटियों पर प्रगति करने की है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसी बातों की आज ज्यादा फ़िक्र अपने समाज में नहीं दिखती।
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