अब अगले साल ही होगा मोदी मंत्रिपरिषद में फेरबदल
पिछले एक साल से भी अधिक समय से सत्तारूढ पार्टी के सूत्रों के हवाले से थोडे-थोडे दिनों के अंतराल पर खबर आती है कि प्रधानमंत्री जल्दी ही अपनी मंत्रिपरिषद में फेरबदल करने वाले हैं, लेकिन वह अवसर अभी तक नहीं आया है। अलबत्ता इस बीच पिछले एक साल के दौरान अलग-अलग वजहों से सात मंत्री हटाए जा चुके हैं।
द न्यूज लॉन्चर ब्यूरो
नरेंद्र मोदी की तीसरी सरकार का लगभग आधा कार्यकाल पूरा हो चुका है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी अभी तक अपनी मंत्रिपरिषद का विस्तार और फेरबदल नहीं कर पा रहे हैं। पिछले एक साल से भी अधिक समय से सत्तारूढ पार्टी के सूत्रों के हवाले से थोडे-थोडे दिनों के अंतराल पर खबर आती है कि प्रधानमंत्री जल्दी ही अपनी मंत्रिपरिषद में फेरबदल करने वाले हैं, लेकिन वह अवसर अभी तक नहीं आया है और अभी भी तय नहीं है कि मंत्रिपरिषद में फेरबदल कब होगा। अलबत्ता इस बीच पिछले एक साल के दौरान अलग-अलग वजहों से सात मंत्री हटाए जा चुके हैं।
मंत्रिपरिषद का विस्तार नहीं हो पाने और सात मंत्रियों के इस्तीफे हो जाने की वजह से कई मंत्रियों के पास दो-दो, तीन-तीन मंत्रालयों का अतिरिक्त प्रभार है। कई मंत्रियों को यह आशंका है कि मंत्रिपरिषद के फेरबदल में उन्हें हटाया जा सकता, इसलिए वे अपने मंत्रालय के कामकाज पर ध्यान ना देते हुए महज समय काट रहे हैं। मंत्रिपरिषद में फेरबदल टलते जाने के पीछे एक वजह यह भी बताई जाती है कि प्रधानमंत्री ने अपने सभी मंत्रियों से इस्तीफा देने को कहा है लेकिन कई वरिष्ठ मंत्रियों ऐसा करने से इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा है कि प्रधानमंत्री चाहें तो वे उन्हें हटा दें लेकिन वे खुद इस्तीफा नहीं देंगे।
पिछले दिनों कहा गया था कि सरकार पहले महिला आरक्षण कानून में संशोधन का बिल और परिसीमन बिल पास कराएगी उसके बाद ही मंत्रिपरिषद में फेरबदल होगा। इसका कारण यह बताया जा रहा था कि भाजपा के संसदीय प्रबंधक कई पार्टियों से बात कर रहे हैं, जिनके नेताओं को मंत्री बनाने का भरोसा दिया जा रहा है। ऐसे में किसी का भरोसा तोड़ने का रिस्क संसद सत्र से पहले नहीं लिया जा सकता है। इसमें खासतौर से एकनाथ शिंदे की शिवसेना, शरद और सुनेत्रा पवार दोनों की एनसीपी, एमके स्टालिन की डीएमके आदि पार्टियों का नाम लिया जा रहा है।
हालांकि शरद पवार और स्टालिन की पार्टी सरकार में शामिल होगी, इसे लेकर अब भी संशय है। परंतु यह बात लगभग तय है कि शरद पवार की पार्टी परिसीमन और महिला आरक्षण का समर्थन करेगी। डीएमके भी कुछ अगर मगर के साथ समर्थन के मूड में है। लेकिन इतने से सरकार दो तिहाई संख्या नहीं पूरी कर पा रही है। अगर संख्या पूरी नहीं होती है तो यह तय है कि शीतकालीन सत्र से पहले फेरबदल नहीं होगी।
कई जानकारों ने पहले दशहरा से दिवाली के बीच यानी 20 दिन का विंडो दिया था। उनका कहना था कि इस बीच सारे बड़े फैसले होने हैं। लेकिन अब दिवाली आ गई। अब अगले कुछ दिन तक कोई फेरबदल नहीं होने वाला है। अब त्योहार शुरू हो गए हैं। आठ नवंबर को दिवाली है। फिर गोवर्धन पूजा और उसके बाद भाईदूज। फिर पूर्वी भारत में तीन दिन तक छठ की धूम। छठ के बाद संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने का समय आ जाएगा। सत्र के दौरान कोई फेरबदल नहीं होगा।
शीतकालीन सत्र आमतौर पर 20 दिसंबर के आसपास खत्म होता है और उससे पहले 15 दिसंबर से 14 जनवरी तक मलमास शुरू हो जाता है। उस बीच कोई बड़ा काम नहीं होता है। 15 जनवरी के बाद संसद के बजट सत्र की उलटी गिनती शुरू हो जाती है। 28 जनवरी से बजट सत्र होता है। सो, अगर शीतकालीन सत्र में सरकार चमत्कारिक तरीके से दो तिहाई बहुमत जुटा लेती है और महिला आरक्षण कानून में संशोधन का बिल पास करा लेती है तब भी 15 जनवरी से पहले फेरबदल की संभावना कम दिख रही है। उसके बाद बजट सत्र से पहले का 13 दिन का विंडो है।
ध्यान रहे बजट सत्र के बीच ही उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के चुनाव की घोषणा हो जाएगी और बजट सत्र के पहले व दूसरे चऱण के बीच इन राज्यों में चुनाव होगा। सो, अप्रैल में बजट सत्र के बाद ही मंत्रिपरिषद में फेरबदल की संभावना दिख रही है।
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